सच और साहस की जीत ! पी.के. है क्या ?

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“हमका लागत है भगवान से बात करे का कम्यूनिकेशन सिस्टम इस गोला का टोटल लूल हो चुका है….”

पी.के. का यह कालजयी संवाद यूं तो सभ्यता के इतिहास की कई त्रासदियों में भगवान की घनघोर असफलता को रेखांकित कर सकता है, लेकिन पिछले एक साल में सूरज का चक्कर लगाते समय इस गोला पे जो कुछ हुआ, वह भगवान को एक और बार डपट कर पूछने के लिए तो काफी है ही कि “पी.के. है क्या !”

जी हां. जो खेला मैं आपको सुनाने जा रहा हूं, उसका नायक पी.के. ही है. लेकिन ठहरिए, इससे पहले कि आमिर खान के पी.के. चरित्र को याद कर आपके चेहरे पर एक पलायनवादी हास्य चमक जाए, मैं आपको सावधान कर देना चाहता हूं. इस खेला में अगर आपको हास्य मिलता है तो यह आपका नपुंसक बडप्पन है. मैंने तो बस एक विद्रूपता को बयान करने की थेथरई दिखाई है. लेकिन मैं खुशकिस्मत रहा कि मुझे अपने खेला के नायक को दूसरे गोले से ई पिरिथवी पर उतारने की जरूरत नहीं पडी. बल्कि मेरे दोनों पी.के. मुझे रामकली के बिहार में ही मिल गए. बॉलीवुड के कुंभ में बिछडे दो भाईयों की तरह जिनमें एक के पास गाडी, बंगला, बैंक बैलेंस सब कुछ होता है और दूसरे के पास एक चार पांच सौ रूपये जैसी नौकरी, एक किराये का क्वार्टर और एक सरकारी जीप से ज्यादा कुछ नहीं होता…..! (ठीक नोटिस किए आप) बिहार जैसे रियलिस्टिक जगह में आपके पास ‘मां’ होने का कोई मतलब नहीं. यहां आपको बाप चाहिए. और अगर किसी ने आपकी किस्मत में लिख दिया कि ‘मेरा बाप चोर है’ तो आपको उसके साईन की जरूरत नहीं, उसकी कृपा की जरूरत है जिसने आपको यकीन दिला कृतार्थ कर दिया कि आपका बाप चोर है और आप डकैत बनने को हाईली मोटिवेटेड हो गए.

2014-15 सीजन में काल्पनिक पी.के. के अलावा दो वास्तविक पी.के. बिहार में रिलीज हुए. कमबख्त दोनों किशोर ही रहे. दोनों विदेश के संभावनाओं के संसार को वापस छोड कर आए. दोनों बिहार के लिए आए. दोनों ने सुशासन बाबू के लिए काम किया. और तो और दोनों का जुडाव कमबख्त हेल्थ सेक्टर से रहा. लेकिन भगवान की फिरकी देखिए…”मैं कहां आ गया, और तुम कहां रह गए…”. एक कुपोषण पर कुछ बातें बनाते बनाते प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बनाने लगा और दूसरा आपके लिए हॉस्पीटल बनाते और दवा खरीदते हुए जहर पीता गया. लोगों ने पहले को चंद्रगुप्तों का चाणक्य बताया तो दूसरा सत्ता के मद में चूर सिकंदरों के सामने बेडियों में जकडा बेबस पोरस नजर आया. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि जब एक पीके की प्रशस्ति में मीडिया के बाणभट्ट, वत्सभट्टि जैसे चाटुकार कसीदे कस रहे थे, आपको उस पीके के बारे में पता भी नहीं था जिसने बिहार को बनाने के जूनून में खुद को बर्बाद कर दिया. सवाल सिर्फ ‘बाप’ (अंग्रेजी में बोले तो गॉडफादर) का नहीं है. सवाल यह भी है कि सफलता की भोंडी चकाचौंध में आप किस तरह दीये की रोशनी को चाईनीज बल्ब से प्रतिस्थापित करने की हवस रखते हैं. वीकएंड पर आईटम दिखा कर आपका 100 करोडी बलात्कार हो जाता है और आप वर्किंग डेज पर मीडिया के भडवों के समक्ष नतमस्तक हो जाते हैं कि आपका सत्याग्रह तब कहां था जब किसी और गुंडे ने आपके साथ मुंह काला किया था. ठीक ही कहा पी.के. ने कि “मेमोरी और ठुकाई का कुछ डायरेक्ट कनेक्शन है…”. आप ठुकते रहेंगे तो आपकी यादाश्त बनी रहेगी. आपको वो नहीं चाहिए जो सच में आपको कुपोषण से मुक्ति दिलाकर आपकी शारीरिक और दिमागी हालत को बेहतर बनाए. आपको तो वो चाहिए जो कम से कम बिहार में बहार होने का ऑर्गेजम बनाए रखे.

बहरहाल मेरे इस खेला में सब कुछ है. एक्शन, ड्रामा, धोखा, नाच, तमाशा सब कुछ. बस कुछ नहीं है तो वह है आप जैसे दर्शक. कहते हैं खरीदने बेचने की मार्केट इकॉनोमी में ‘सब्स्टेंस’ से ज्यादा ‘फॉर्म’ का ही महत्व है. आप अपने पिलपिले माल को भी कितना चमका सकते हैं, आपका पूरा सक्सेस गेम उसी पर टिका है. आज पॉलीटिक्स और ब्यूरोक्रेसी में भी मार्केट के व्यापारी और दलाल ही खेल रहे हैं. आपको कुछ आए ना आए, ‘मैनेज’ करना आना चाहिए. और इसके लिए तो बजब्ते ‘मैनेजमेंट’ की पढाई भी होती है. विडम्बना देखिए कि हमारा एक पी.के. मैनेज करना ही नहीं जानता था और दूसरे को सिर्फ मैनेज करना ही आता था. आखिर अब रोज रोज कितने चुनाव मैनेज होते है ?

लेकिन इस खेला में ट्विस्ट इंटरवल के बाद आता है. एक दिन हमने देखा कि दूसरे गोला से आया हुआ हमरा पीके ई मायावी पिरिथवी में जीना चाहता है. यहीं का पीके बन के. वो अपने गोला पर वापस जाने के कतरा रहा है. उसे लगता है कि वो इस जाहिल दुनियां को बदल सकता है. वही दुनियां जिसने उसे न जाने कितने कीचड में घसीटा. गलियों में जम चुके बारिश के पानी में आप कभी हेले हैं कि नहीं ? नहीं हेले हैं तो एक बार ट्राय कीजिएगा. अद्भुत अनुभव होता है. बस खाली आपका मन न किचकिचा जावे कि गली के दोनों ओर कल तक जो पंक्तिबद्ध लोग अपने ऊत्सर्जन तंत्र को राहत दे रहे थे उनके ऊत्सर्जित पदार्थ इन बारिश की पानी और उनमें तैरते कितनी कागज की कश्तियों में कितनी बार अपने होने का एहसास दिला चुके हैं….! अपना पीके इन गलियों से होकर फिर से क्यों गुजरना चाहता है ? वो भी तब जब दूसरा पीके अब राजा का ऑफ़िशियल विदूषक है. हां आजकल आपलोग उसी को एडवाईजर बोलते हैं…सलाह देने वाला. चुनाव के मैनेजमेंट के बाद अब राज्य का मैनेजरी किया जाएगा. लेकिन विडम्बना तो यह है कि अपना पीके उन सलाहों को जमीन पर लाना चाहता है….! सुनते हैं कलियुग आते समय राजा परिक्षीत के सिर पर जा बैठा था. अब उसे उतरते देख रहा हूं….वही सिर पर से ही.

बस यहीं पर आ के हमारे फिलिम का लुटिया डूब गया. हम इतना फ़्रस्टेट हुए कि कुछ क्लाईमेक्स ही नहीं सूझा. कि ई साला क्या हो रहा है! जिनके उसूलों और आदर्शों को गूंथकर कभी दो वक्त की रोटियां नहीं बनाई जा सकती थी वो आज उन्हें पिज्जा से एक्स्चेंज को क्यों तैयार है ? जिसके पास मां होने का गर्व था, उसे बाप क्यों और किसलिए चाहिए ?…….मैं बस अपने फिलिम के ट्रेजिक एंड का ऑस्करी जस्टिफ़िकेशन ढूंढ रहा हूं. धंधे की चिंता नहीं अब. पहले सोचा था अंत में सुखविंदर के अलाप के साथ आप दर्शकों के दिल को हिला डालूंगा कि “सच और साहस है जिसके मन में, अंत में जीत उसी की रहे….”, लेकिन अब ई सब आदर्शवादी भोमिटिंग ठीक नहीं रहेगा. मुद्दे आधारित फिलिम का पोस्टर चिपका के अपने परकास झा की तरह कभी स्मिता पाटिल का पोटेंशियल रखने वाली चित्रांगदा को अंत में कुछ ऊं आं वाली आवाज के साथ नचा दिया जाएगा – “कुंडी न खडकाओ राजा, सीधा अंदर आओ राजा…..”. भक साला ! अब न बनाएंगे कभी फिलिम विलिम.

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